क्यू नहीं सिर्फ माता पिता रह पाते हैं”

समाज में रहने के लिए क्यों समाज होना पड़ता है?
हम क्यों नहीं सिर्फ माता-पिता बनकर सोच पाते हैं…
क्यों नहीं उसके भोलेपन पर तरस खाते हैं. ..
क्यों दुनिया की भीड़ में खड़ा होने के सौ – सौ नियम बताते हैं..
क्यों अपने बच्चों के बचपन पर घातक तलवार चलाते हैं…
क्यों नहीं सिर्फ माता-पिता बन पाते हैं?
इस सोच से होकर बेफिक्र की…
समाज क्या कहेगा ?
लोग क्या सोचेंगे?
जीवन कैसे चलेगा?
वह सफल कैसे बनेगा?
क्यों नहीं उसे बचपने में ही रह जाने देते हैं.
क्यों उसे दुनिया की रेस में शामिल कर तन्हा कर देते हैं ,
भोलेपन और मासूमियत से कर जुदा, मुकम्मल इंसान बनाते हैं…
छीन कर उसका बचपन उस पर दुनियादारी की चाबुक चलाते हैं..
क्यों हम बेरहम हो उसे भी बेरहम, खुदगर्ज बनाते हैं…
क्यों उसे अपनी ममता से महरूम कर जाते हैं..
यह जानते हैं की बचपना तो हमारे अंदर भी शोर गुल मचाता है
फिर क्यों? अपने बच्चों के बचपन पर घातक तलवार चलाते हैं…