सौ फ़ीसदी औरतें और कुछ प्रतिशत पुरुष की जिंदगी में एक दिन यह अनुभव जरूर आता है।
अगर आप अपनी पत्नी को समझना चाहते हैं तो अपने उस अनुभव को फिर से याद करें,
जब आप अपना घर- संसार, माता-पिता, सगे – संबंधी से दूर कहीं पढ़ने गये हो, या फिर नौकरी के उद्देश्य से आए हो। पहली बार आप उन अनजाने लोग, अजनबी शहर या गांव में कैसा महसूस कर रहे थे।
अगर आपको किसी भरे, पूरे परिवार में रहने का मौका मिला हो तो आपके लिए यह समझना और भी आसान हो जाएगा, ठीक ऐसे ही एक लड़की एक अनजाने घर में महसूस करती है, जब अपना सब छोड़कर आपके परिवार का हिस्सा बनती है, वही अजनबीपन, वही बेबसी, वही बेगानापन, वह नए परिवेश में ढलने की तमाम कोशिश कर रही है क्योंकि जानती है उसके वापस जाने के सारे रास्ते बंद है, ताउम्र यही रहना है, यहीं.. इसी माहौल में सरवाइव करना है, डरी, सहमी, यहां अपनी तमाम कोशिश, तमाम जतन के साथ अरजेस्ट करना चाह रही है आप उसकी मनोस्थिति समझ पा रहे हैं, क्या आपने उसको उतना सपोर्ट किया, जितना करना चाहिए था किसी के साथ घंटे, दो घंटे, गुजारना अलग बात है पर किसी के साथ पूरे वक्त गुजारना, अपना सब कुछ साझा करना, इतना आसान नहीं।
चार दिन ससुराल में आप मेहमान की वजाय मेजबान बनकर रहें आपको समझ आ जाएगा।
कभी अपनी पत्नी को मायके में गौर से देखिएगा वह कितनी बेफिक्र, बेवाक और स्वच्छंद दिखती है फिर आप इस लड़की को उसके ससुराल में या अपने ही घर में देखना वह कितनी जिम्मेदार, फिक्रमंद और परेशान सी दिखती है क्योंकि कुछ जिम्मेदारियां उसने स्वयं ओढ़ ली है तो कुछ आपने लाद दिया है, फिर भी वह बिना शिकायत के सब निभाये जा रही है वह आपकी जीवन- संगिनी है उसे समझने की कोशिश करें, जितना संभव हो उसे उतना खुश रखें।