तुम कैसी दिखती होगी

मेरे महबूब की महबूबा सुनो,
सोचती हूं मैं, तुम कैसी दिखती होगी?
जिन आंखों में है मेरी तस्वीर.
उनमें तुम बसती होगी,
जिसे उसने कहा होगा चाँद …
जिसके दीदार से उसे आता होगा करार ….
वह कलाई जिसपे सजी होगी,
मुझसे पहले मेरे मान की चूड़ियां..
मेरे लिए धड़कने वाली सांसे,
बेसब्र होतीं होगी….
आखिर तुम कैसी दिखती होगी….
चांद तारों को तोड़ लाने के किए होंगे वायदे,
मेरे साथ वचन निभाने से पहले…
हो पति-पत्नी का प्रेम चाहे कितना भी गहरा..
प्रेम का एहसास उसने किया होगा तेरे साथ,
मेरे आने से पहले…
क्या तुम आज भी याद आती होगी …
मुझसे प्यार जताने से पहले
आज भी तेरे प्यार की टीस क्या उठती होगी..
तुम कैसी दिखती होगी….