“बुरा ना मानो इंसा हैं”

प्रकृति में कितनी विविधताएं हैं और प्रकृति से जुड़े त्यौहार कि भारत में।
चमकीले रंग- बिरंगे होली की छटा तो होली प्रेमियों को दूर से ही दिख जाती है, सच पूछो तो होली की हुडदंग को बचपन का संग कहने में कोई बुराई नहीं नहीं है।
साल भर की थकान, जिम्मेदारी, नफरत, अपना बिजी शेड्यूल, मूड स्विंग भुलाकर, एक दिन के लिए बच्चा बन जाने के लिए अपनी शरारत को फिर से जिंदा करने के लिए ही यह दिन आता है। मात्र एक दिन ही क्यों मिलता है होली के नाम से, होली- मतलब “बुरा न मानो” बस एक दिन। “बुरा ना मानो” बाकी दिन छोटी-छोटी बातों पर गाली- गलौज, मारपीट, लड़ाई – झगड़ा और होली के एक दिन “बुरा ना मानो” क्योंकि होली है। चमकीले रंगों की मोहब्बत वाली यह होली रोज क्यों नहीं होती और जीवन के हर पल यह स्लोगन क्यों नहीं चल पाता “बुरा ना मानो जीवन है” हम इंसान हैं, गलतियां हो जाती हैं, किसी को रंग पसंद नहीं, किसी को कीचड़ पसंद नहीं, किसी को गुलाल पसंद नहीं, फिर भी लगा दो, कोई पूछ कर नहीं लगाता, भाई! तुम्हें क्या पसंद है, या क्या नापसंद है,
यहां पसंद और ना पसंद का सवाल ही नहीं होता क्योंकि
” बुरा ना मानो
होली है”
अगर होली के दिन की तरह हर दिन हम मर्यादित गलतियों को नजरअंदाज कर जांए, कर पांए, तो हमारी जिंदगी, हमारा समाज, हमारे नैनीहाल, कितने सुख पूर्वक जिएंगे, कितनी अच्छी-अच्छी बातें सीखेंगे और धैर्यवान बन जाएंगे।
आज की होली में मिलावट सही पर पारंपरिक होली की एक खासियत आज भी याद है हमें-
“बुरा ना मानो होली है”