महफ़िल ( ये दुनिया ये महफिल किसी के काम की नहीं)

यह जो महफ़िल सजी है, लगी है भीड़…
खुशी में ठहाके लगाने वालों की बस्ती है!
यह संग खड़े हैं क्योंकि चारों तरफ मस्ती ही मस्ती है!
पीड़ा और वेदनाएं समझने की संवेदनाएं खो चुकी है,
तुम्हारे दुख में खुदगर्ज हो अनजाने बन जाने की तेजी से रीत चली है…
ये भीड़ ये महफिल भला क्यों सजाऊ?
क्यों ना खुशियां भी अपनी तन्हा ही मनाऊं?
क्यों खुद को महफिल का झूठा ढाढस दिलाऊ,
क्यों ना अपने परिवार के संग ही हर सुख दुख मनाऊं
जो दर्द में मेरे साथ खड़े हैं
मेरे झूठ पर भी समाज में अड़े हैं
आंसू के मेरे गवाह बने हैं,
मेरे ही रंग ढंग में रंगे हैं..
Priti kumari