वह चहलकदमी करते हुए कभी बालकनी में जाती, कभी गैलरी में तो कभी टेरिस पर,
एक-एक गमले को बड़े ध्यान से देखती फिर वापस आकर सोफे पर बैठ जाती, थोड़ी देर बाद फिर से उठती वही सब दोहराती, एक महीने हो गए उसे उसके पसंद का खाना नहीं मिल पा रहा है। खाने के लाले पड़े हैं। महंगे हुए खाद्य पदार्थ और सब्जियां वह भी आसानी से नहीं मिलते, कुछ पर तो सीधे चेतावनी लगी थी, केमिकल मात्रा अधिक, उपयोग सीमित करें।
सारे न्यूज़ चैनल पर बस एक ही खबर- इस बार केमिकल वाली बारिश और गंदी नालियों की वजह से पानी जहरीला हो गया है, मिट्टी में जहर है और उस मिट्टी में उगी फसलों में भी, हवा भी जहरीली हो गई है।
चारों तरफ त्राहिमाम – त्राहिमाम।
लोग या तो पैकेज फूड खा रहे हैं या छोटे-छोटे जानवरों को खाने के नए ऑप्शन तलाश रहे हैं। चारों तरफ ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारत में घुसे पड़े लोग। हर फ्लैट सुविधा से लेश, साज समान से सुशोभित, पैसे की कोई कमी नहीं, फिर भी खाने के लाले पड़े हुए हैं। प्रकृति के बेईमानी चेहरे ने इंसान को हकीकत का कुरूप चेहरा दिखा दिया है। प्रकृति के प्रति संवेदनहीनता, बेपरवाही का अंजाम आज सबके सामने था। वह चावल, दाल, सब्जी, रोटी जो आसानी से हर घर में उपलब्ध थे, लोग जितना मर्जी खाते बाकी कूड़ेदान के हवाले कर देते। प्रकृति अगर संवेदनहीन और स्वार्थी हो जाए तो मानव की सारी हेकड़ी एक मिनट में निकल जाए। यह सब सोचते सोचते सरला जीवन के उन दिनों में खो गई, जब उसने महानगर में अपना विला खरीदा था।
महानगर में अपना घर होना बहुत बड़ी बात है। गांव की जिंदगी भी कोई जिंदगी है, कोई लाइफस्टाइल नहीं, गांव के लोगों के साथ उसका मेंटल स्टेट्स मैच नहीं करता। अंधेरा होते ही सब अपने घर में दुबक जाते हैं। महानगर में क्या दिन, क्या रात, काम करने के लिए बहुत सारा वक्त मिल जाता है। सारी सुविधाएं आसानी से मिल जाती है, पर गांव में ना ढंग का स्कूल है, ना अस्पताल और ना ही जीवन।
वे इतराते हुए अपने छोटे से बालों में हाथ फेरती हुए कहती, तो गांव की औरतें उसे अजीब नजरों से घूरती हुई वहां से निकल जाती।
आज खुद का वह बर्ताव, व्यवहार उसे ही लज्जित कर रहा है ,वही पिछड़ा गांव उसे बुला रहा है। रात को सोते-सोते वह उन्हीं गांवों में पहुंच जाती है, वहीं के गंवार, अनपढ़ लोग उसके सपने में उससे प्यार जता रहे होते हैं, और वही सारे लोग आज उसे परिपक्व और समझदार लग रहे हैं, वास्तविकता के पास और उससे ज्यादा अमीर…. जिसके पास जीवन की सारी बेसिक चीजों आसानी से उपलब्ध है- रोटी, कपड़ा और मकान और शुद्ध सांसे भी….
शहर के दिखावे की यह दुनिया बहुत ही कठोर और निर्मोही जान पड़ती है आज…
कितनी खुश थी वह जब यहां अपना घर खरीदा था। कुल देवता की पूजन के लिए जब गांव गई उसके कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। हर गृहणी की तरह उसका सपना पूरा हुआ था उसका अपना घर, सपने का घर, एक एक चीज़ करीने से सजाई वास्तु के साथ-साथ यूनीक चीजों का चुनाव किया … शाम को जब सब लोग दलान (ओसारा) में बैठे हुए थे, बातचीत के दौरान वह अपने घर के बारे में बताने लगी- हमने दस लाख का इंटीरियर करवाया है, झूमर, लाइटिंग, यूनिक और खूबसूरत फर्नीचर….
जब उसकी नजर पति से टकराई तो पति ने चुप रहने का इशारा किया । वह चुप रहने की वजाय अपनी पड़ोसन के बारे में बताने लगी, उसने तो अपने गांव का जमीन बेचकर घर का इंटीरियर करवाया, बहुत खूबसूरत घर है उसका।
अभी उसकी बात खत्म हुई नहीं थी कि वही खाट पर लेटे दादाजी उठ बैठे। उनके उठते ही वह चुप हो गयी। थोड़ी देर खामोशी पसरी रही, फिर दादाजी बोले, जमीन बेचकर ईट पत्थर में लगा दिया.. फिर आदित्य की तरफ मुखातिब होकर बोले कुछ ढंग का काम भी किया है। घर के अलावा थोड़ी सी भी जमीन है क्या? आदित्य बोले, हां! थोड़ा सा गार्डन एरिया है घर के बाहर, उसमें हमने पौधे लगाए हैं.. दादाजी फिर सवाल कर बैठे, कौन-कौन से पेड़ लगाए हो? बगीचे में कुछ आम का भी लगा लेते, बच्चों को फल मिल जाता, कुछ शीशम वगैरह लगा लेते सोना बरसता है इन सब से…
बात यहीं खत्म हो गई थी क्योंकि हमारी सोच मैच नहीं कर रही थी हम कहां डेकोरेटिव पौधे लगा रहे थे. .
आज उनकी कहीं बातों का गुढ रहस्य समझ में आ रहा था वह कितना सही कह रहे थे। उनकी बातों का अर्थ पैसे से नहीं बल्कि ऑक्सीजन से भी था, हमारे आसपास के वातावरण से भी था। वाकई पेड़ सोना उगलता है( पौधे की अपेक्षा पेड़ ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं और जल्दी मरते भी नहीं )