“चिल्लर वाली गुल्लक”
आज घर में पूजा थी पूजा में चिल्लर (सिक्के) की जरूरत तो होती ही है, पंडित जी के कहने पर हमेशा की तरह मैंने गुल्लक खोल कर, पलट दिया पर मुश्किल से उसमे दो- चार रुपये मिले होंगे। फिर मैं चिल्लर वाले पर्स की तरफ भागी, शुक्र था कि उसमें जरूरत भर रुपये मिल गए।
वक्त इतनी तेजी से बदला की कहाँ पर्स और कहाँ गुल्लक… (पर्स जो औरतें के कंधे की शान बढ़ाती है उसे स्टाइलिश बनाती है।
मुझे माँ बनने के बाद कभी रास नहीं आयी, बच्चा सम्हालती या पर्स
बड़ी दुविधा में रही मैं हमेशा…मेकअप से भी अपना वास्ता नहीं है
कभी कभी सोचती हूँ लड़के जैसे मिजाज़ क्यूँ दिया जब लड़की बनाया तो….
मेरे लिए मुझे अपना हाथ फ्री ही अच्छा लगता है आज भी… )
खेैर भगवान ने मेरी सुन ली 
अब अपने कपड़े में पॉकेट होना माँगता बस, बिंदास
. ..
अपना फोन
उठाओ और चल दो, बेपरवाह.. जहाँ मन करे वहाँ, फोन है तो पैसा भी है, पर्स की झंझट खत्म, अब कहाँ याद रहता है पर्श और उसमें रखें पैसे, और चिल्लर के लिए गुल्लक, सब कहीं पड़ा हुआ है. दबा, कुचला, अर्थहीन, अस्तित्वहीन,नगण्य, बेकार..
भगवान की कृपा से ही अब ये कभी – कभी अस्तित्व में आता है।
(जल्द ही भगवान भी यू.पी आई का उपयोग समझ जाएंगे उनका एजेंट अभी तरीका ढूंढ रहा है सीधे भगवान तक श्रद्धा पहुंचाने का
)
Priti kumari