हाय रे जमाना!
लंबी चौड़ी सी लग्जरी गाड़ी मेरे आगे आकर रुकी। एक औरत दरवाजा खोल कर बाहर निकली, उसकी गोद में कोई बच्चा था शायद। जिसे उसने यह रेशमी मुलायम शॉल में लपेटा हुआ था। उसे सीने से चिपका ऐसे चल रही थी मानो कोई उसके बच्चे का अपहरण कर उनसे फिरौती मांग लेगा।
खैर आधुनिक लोगों की आधुनिक बातें तो ऐसे भी मेरे पल्ले नहीं पड़ती पर उसका शॉल मुझे ललचा गया। मैं शॉल में खोई उसका ब्रांड डिजाइन समझना चाहती थी। मेरी आकांक्षा उस शॉल से बंध गई थी कि शायद मुझे भी कहीं मिल जाए और मैं खरीद लाऊं ऑनलाइन सर्च करूं तो!
पर उसी समय उस शॉल से अजीब सी आवाज आने लगी मैं चौक गई। कुत्ते की आवाज कहां से आ रही है? मैं कुत्ते से बहुत डरती हूं कुत्ते के नाम से मुझे नानी-दादी सब की याद आ जाती है। पर यह क्या वह लुभावना शॉल तो मुझे डरने लगा था, वहां कोई बच्चा नहीं है उसमें तो कुत्ता लिपटा था जनाब।
वहीं उसके साथ ही एक और औरत थी जिसके पास उसका अपना बच्चा था। जिसे उसने सीने से लगाने की वजह बेबी कैरियर बैग में अपने पेट से बांधा हुआ था। हाय रे विधाता, हाय रे जमाना, देखो नसीब उस कुत्ते की जो सीने से चिपका मां का प्यार पा रहा है, दूसरी तरफ अभागा यह बच्चा, बैग में झूल रहा है hand free bag में, क्योंकि मां को हाथ फ्री चाहिए। सच में आधुनिकता की यह सारी बातें मेरे पल्ले नहीं पड़ती, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो मेरी समझ से परे हैं, या मैं समझना नहीं चाहती। हम तो भाई जैसे हैं… वैसे रहेंगे…